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मालेगांव उर्दू घर: उद्देश्य से भटकाव और संरक्षण की आवश्यकता

By – Waseem Raza Khan

महाराष्ट्र का मालेगांव शहर हमेशा से अपनी समृद्ध सांस्कृतिक, साहित्यिक और शैक्षणिक परंपराओं के लिए पहचाना जाता रहा है। वर्ष 2014 में राज्य सरकार ने महाराष्ट्र के कुछ शहरों में उर्दू घरों के निर्माण के लिए निधि आवंटित की थी, जिसमें मालेगांव भी शामिल था।

राज्य सरकार और विधायक निधि से लगभग 8 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि खर्च कर ‘उर्दू घर’ के निर्माण की नींव रखी गई थी। उस समय शहर के बुद्धिजीवियों, शिक्षकों और विद्यार्थियों में एक नई उम्मीद जगी थी। यह महज ईंट-पत्थर से बनी एक इमारत नहीं थी, बल्कि इसे उर्दू भाषा के एक उच्चस्तरीय शोध एवं अध्ययन केंद्र के रूप में विकसित करने की परिकल्पना की गई थी। योजना थी कि इसे किसी प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय से मान्यता दिलाई जाएगी, जहां भाषा विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं और अनुभवी शिक्षकों की नियुक्तियां की जाएंगी। इसका उद्देश्य स्थानीय युवाओं और शोधार्थियों को उर्दू भाषा, साहित्य और अनुसंधान के क्षेत्र में नए अवसर उपलब्ध कराना था।

उर्दू घर का निर्माण वर्ष 2019 में पूरा कर लिया गया, लेकिन कोरोना महामारी के कारण इसका औपचारिक उद्घाटन वर्ष 2022 में किया गया। दुर्भाग्यवश, चार वर्ष बीत जाने के बावजूद यह महत्वाकांक्षी परियोजना अपने मूल उद्देश्यों से काफी दूर नजर आ रही है। उर्दू भाषा और शोध का केंद्र बनने के बजाय यह इमारत महज एक हॉल या ऑडिटोरियम तक सीमित होकर रह गई है, जिसे तहसील प्रशासन विभिन्न कार्यक्रमों के लिए किराये पर देता है। विश्वविद्यालय से संपर्क, स्थायी शैक्षणिक कर्मचारियों की भर्ती और शोधार्थियों के मार्गदर्शन की व्यवस्थाएं आज भी केवल कागजी कार्रवाई और दावों तक सीमित हैं।

हाल ही में उर्दू घर के परिसर में राजनेताओं द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस जैसी गतिविधियों के आयोजन ने एक नई चिंता पैदा कर दी है। इस तरह की गतिविधियां उर्दू घर की साहित्यिक और शैक्षणिक गरिमा के अनुरूप नहीं हैं। यदि समय रहते इस पर रोक नहीं लगाई गई तो यह संस्थान शैक्षणिक केंद्र बनने के बजाय राजनीतिक गुटबाजी और बैठकों का अड्डा बनकर रह जाएगा। ऐसी आशंका भी है कि कुछ विशेष राजनीतिक परिवार इसे अपनी निजी संपत्ति समझने लगें और शिक्षा का यह केंद्र एक पार्टी कार्यालय में तब्दील हो जाए।

किसी भी भाषा विकास केंद्र या शोध संस्थान के प्रभावी संचालन के लिए कानूनी और प्रशासनिक स्पष्टता आवश्यक है। वर्तमान में राज्य सरकार की ओर से यहां केवल एक प्रशासक नियुक्त किया गया है।

किसी भी केंद्र को सरकारी शोध संस्थान का दर्जा प्राप्त करने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) और संबंधित राज्य विश्वविद्यालय, जैसे सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय या डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय, के नियमों के तहत संबद्धता प्राप्त करना आवश्यक होता है। किसी भी भाषाई शोध केंद्र का सफल संचालन तभी संभव है, जब वह राज्य सरकार के उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग अथवा अल्पसंख्यक विकास विभाग के प्रत्यक्ष नियंत्रण और बजटीय सहायता के अंतर्गत कार्य करे।

उर्दू घर के मूल स्वरूप और उद्देश्य का संरक्षण केवल सरकार की ही नहीं, बल्कि मालेगांव के उर्दू भाषा विशेषज्ञों, शिक्षकों, पत्रकारों, लेखकों और बुद्धिजीवी नागरिकों की भी नैतिक जिम्मेदारी है। अब समय आ गया है कि शहर का साहित्यिक और शैक्षणिक वर्ग एकजुट होकर इस उद्देश्य के लिए अपनी आवाज बुलंद करे, ताकि इस संस्थान को राजनीतिक प्रभाव से सुरक्षित रखा जा सके।

उर्दू घर के परिसर में किसी भी राजनीतिक दल की प्रेस कॉन्फ्रेंस, बैठक या राजनीतिक कार्यक्रम आयोजित करने पर तत्काल कानूनी प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। इसका उपयोग केवल शैक्षणिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक सीमित रखा जाना चाहिए।

उर्दू घर का प्रशासन और नियंत्रण महाराष्ट्र सरकार के अल्पसंख्यक विकास विभाग, उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग अथवा किसी निजी संस्थान के प्रत्यक्ष अधीन किया जाना चाहिए। इस केंद्र को राज्य के किसी प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय से शोध केंद्र के रूप में तत्काल मान्यता दिलाई जानी चाहिए।

विद्यार्थियों और शोधार्थियों के उचित मार्गदर्शन के लिए योग्य भाषा विशेषज्ञों, रिसर्च कोऑर्डिनेटरों, पुस्तकालयाध्यक्षों और शैक्षणिक कर्मचारियों के स्वीकृत पदों के लिए विज्ञापन जारी कर स्थायी नियुक्तियां की जानी चाहिए। शोधार्थियों के लिए दुर्लभ पुस्तकों, पांडुलिपियों, डिजिटल कैटलॉग और इंटरनेट आधारित रिसर्च लैब की व्यवस्था भी की जानी चाहिए।

यदि उर्दू घर को उसका मूल शैक्षणिक और कानूनी ढांचा उपलब्ध कराया जाता है, तो यह न केवल मालेगांव बल्कि पूरे महाराष्ट्र राज्य के लिए उर्दू साहित्य और शोध के क्षेत्र में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। अन्यथा वह दिन दूर नहीं, जब यहां राजनीतिक सभाएं आयोजित होने लगेंगी या संभव है कि इस इमारत को शादी-ब्याह जैसे समारोहों के लिए किराये पर देना शुरू कर दिया जाए।

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