वसीम रज़ा खान (वरिष्ठ पत्रकार – 9370170870)
स्थान: बॉम्बे हाई कोर्ट, कोर्ट रूम
पात्र: जज, टीपू सुल्तान, याचिकाकर्ता के वकील
जज: याचिकाकर्ता कौन है?
(डिप्टी मेयर शान-ए-हिंद खड़ी होती हैं, लेकिन उसी दौरान अदालत में मैसूर के पूर्व शासक टीपू सुल्तान ऐतिहासिक पोशाक में पहुंच जाते हैं. सभी हैरान होकर उन्हें देखने लगते हैं.)
जज: (हैरानी और ताज्जुब के भाव के साथ) टीपू सुल्तान? इतिहास के पन्नों से निकलकर आज इस इक्कीसवीं सदी की अदालत में!? यकीन करना मुश्किल है. आप अदालत में कैसे, बताइए, आप अदालत से कुछ कहना चाहते हैं?
टीपू सुल्तान: (अदालत को सम्मान से सलाम करते हुए) माई लॉर्ड! पहले तो माफी चाहता हूं कि इस तरह बिना बताए इक्कीसवीं सदी की अदालत में पहुंच गया हूं.
जज: कोई बात नहीं, बताइए… किस लिए तशरीफ लाए हैं?
टीपू सुल्तान: माई लॉर्ड, मुझे याचिकाकर्ता की मांग से संबंधित अपनी बात रखनी है.
जज: कहिए.. आप वर्तमान सदी की अदालत में हैं, इसलिए आपको अपनी बात रखने का अधिकार दिया जाता है.
टीपू सुल्तान: माई लॉर्ड, इतिहास का काम अतीत की गवाही देना है, वर्तमान के राजनीतिक विवादों का ईंधन बनना नहीं. मालेगांव नगर निगम में मेरी एक तस्वीर दीवार पर टांग दी गई, तो कुछ लोगों की भावनाएं आहत हो गईं. तस्वीर हटा दी गई, तो मामला अदालत तक आ गया. लेकिन मेरा सवाल यह है कि क्या मेरी एक तस्वीर दीवार पर टांग दिए जाने या हटा दिए जाने से मालेगांव की सड़कों के गड्ढे भर गए? क्या पानी की किल्लत दूर हो गई? क्या बच्चों का भविष्य संवर गया?
जज: (गंभीरता से सुनते हुए) आप जो कह रहे हैं, वह जनहित का पहलू है. लेकिन शिकायतकर्ताओं के तर्क हैं कि इतिहास के कुछ अध्यायों से सामाजिक संवेदनशीलता जुड़ी होती है.
टीपू सुल्तान: माई लॉर्ड! अगर संवेदनशीलता इतिहास से जुड़ी है, तो प्रशासनिक क्षमताओं का इस्तेमाल शहर की समस्याओं को हल करने में होना चाहिए, दीवारों पर टंगी तस्वीरों के लिए लड़ने में नहीं. एक शासक के रूप में मैंने अपने दौर में जंगें लड़ीं, लेकिन आज के जनप्रतिनिधियों की जंग गरीबी, अज्ञानता और बदहाली से होनी चाहिए. तस्वीर के आधार पर समाज में दरार पैदा करना और राजनीतिक रोटियां सेकना किस प्रकार का न्याय है? मेरी गुजारिश है कि अदालत शिकायतकर्ताओं और स्थानीय प्रशासन को यह सख्त निर्देश दे कि वे अपना ध्यान वास्तविक जनसमस्याओं और प्रशासनिक सुधारों पर लगाएं.
याचिकाकर्ता के वकील: (बीच में टोकते हुए) माई लॉर्ड! यह जनभावनाओं का सवाल है! तस्वीर से सामाजिक सौहार्द पर असर पड़ता है.
टीपू सुल्तान: (वकील की तरफ देखते हुए मजबूत आवाज में) सौहार्द तस्वीर से नहीं, नीयत और काम से बिगड़ता है! जब आप किसी प्रतीक को नफरत का जरिया बनाते हैं, तब दरार गहरी होती है. अगर प्रशासनिक अधिकारी और नेता दिन-रात सिर्फ इस बात पर बहस करेंगे कि दीवार पर किसकी फोटो रहेगी, तो जनता का काम कब होगा?
जज: (पेन नीचे रखते हुए, सोच-विचार के बाद) टीपू सुल्तान जी, आपकी बातें सिर्फ इतिहास का दृष्टिकोण नहीं, बल्कि आज के लोकतंत्र की कड़वी सच्चाई को दर्शाती हैं. अदालत राजनीति और भावनात्मक मुद्दों से ऊपर उठकर जनता के मौलिक अधिकारों और बेहतर शासन को प्राथमिकता देती है.
(जज अपना फैसला लिखना शुरू करते हैं)
जज: बॉम्बे हाई कोर्ट यह स्पष्ट करती है कि किसी भी शहर का विकास और जनता का कल्याण प्रतीकों की राजनीति से नहीं, बल्कि ठोस प्रशासनिक कार्यों से तय होता है. अदालत शिकायतकर्ताओं और नगर निगम प्रशासन को निर्देश देती है कि वे अपना ध्यान और संसाधन मालेगांव की बुनियादी समस्याओं—जैसे सफाई, सड़क, पानी और स्वास्थ्य सेवाओं के समाधान पर केंद्रित करें. तस्वीरों और प्रतीकों को लेकर बेवजह सामाजिक तनाव पैदा करने की प्रवृत्ति पर रोक लगाई जाए. दफ्तर में तस्वीरें रहें या न रहें, नागरिक विकास कार्य प्रशासन का उद्देश्य होना चाहिए. जहां तक तस्वीरें लगाने का संबंध है, तो टीपू सुल्तान की बातों और उनकी इच्छा का सम्मान किया जाना जरूरी है. याचिका का निपटारा इसी निर्देश के साथ किया जाता है.
(अदालत का माहौल शांत हो जाता है. टीपू सुल्तान जज का शुक्रिया अदा करते हैं और कोर्ट से रुखसत होते हैं.)
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