By- Waseem Raza Khan
जंतर-मंतर का धरना क्या समाप्त हुआ, सत्ता के गलियारों में मानो उत्सव का माहौल बन गया है. अब रोज़ नए-नए शॉर्ट वीडियो, रील्स और ट्रेंडिंग हैशटैग्स का सिलसिला जारी है. विरोध प्रदर्शन में शामिल युवाओं, सीजेपी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को तो ऐसे निशाना बनाया जा रहा है मानो देश की तमाम समस्याओं—बेरोजगारी, महँगाई, और विकास—का इकलौता कारण वही युवा हैं जो हाथ में तख्तियाँ लेकर खड़े थे. लेकिन सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग और रील्स तक मामला सीमित रहता, तो बात अलग थी. यहां तो अति-उत्साही जमात ने एक नया हथियार खोज निकाला है—आरटीआई और जासूसी! हाल ही में खबर आई कि एक ज्ञानी आरटीआई कार्यकर्ता की रातों की नींद अचानक एक नए राष्ट्रीय संकट के कारण उड़ गई. संकट यह था कि सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर बेबाकी से बोलने वाले अभिजीत दिपके अमेरिका में उच्च शिक्षा प्राप्त करने कैसे चले गए? उत्सुकता इतनी बढ़ी कि महोदय ने तुरंत अभिजीत के पिता प्रकाश दिपके की मासिक आय का ब्योरा मांग लिया. आखिर 60-65 हजार रुपये कमाने वाला इंसान अपने बच्चे को विदेश पढ़ने कैसे भेज सकता है शायद इन संवेदनशील खोजी बुद्धिजीवी को किसी ने यह नहीं बताया कि दुनिया में एजुकेशन लोननाम की भी एक चिड़िया होती है. बैंक केवल नेताओं के रैलियों के लिए नहीं, बल्कि आम नागरिकों के बच्चों को पढ़ाने के लिए भी कर्ज देते हैं. और हां, सरकारें खुद गर्व से विज्ञापन छापती हैं कि वे भारतीय युवाओं को विदेश में उच्च शिक्षा के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं. लेकिन जब वही पढ़ा-लिखा युवा वापस आकर सवाल पूछने लगे, तो उसकी डिग्री, उसके पिता की सैलरी और उसके बैंक खाते का पोस्टमार्टम शुरू हो जाता है.
जब तंत्र की कमियों पर रोशनी डालने वाले कॉकरोच बिलों से बाहर आते हैं, तो सामने वाले का बौखलाना स्वाभाविक है. लेकिन बौखलाहट का स्तर इतना बचकाना हो जाएगा, यह किसी ने नहीं सोचा था. सोशल मीडिया पर रील्स बनाकर युवाओं का मज़ाक उड़ाना. उनके परिवारों की आय और निजी ज़िंदगी को खंगालना. शिक्षा पाने के अधिकार पर ही नैतिक सवाल खड़े कर देना. यह तरीका सिर्फ किसी एक व्यक्ति को परेशान करने का नहीं है, बल्कि यह देश के हर उस मध्यमवर्गीय पिता को डराने का प्रयास है जो अपनी सीमित आय के बावजूद अपनी छाती पर पत्थर रखकर, लोन लेकर अपने बच्चे को काबिल बनाता है. यह संदेश देने की कोशिश है कि. पढ़ाओ-लिखाओ, लेकिन अगर बच्चा सवाल पूछेगा, तो हम तुम्हारी कमाई की फाइल खोल देंगे! एक कड़वा सवाल है कि शिक्षा चाहे भारत से मिले, अमेरिका से या चीन से यह हर नागरिक का बुनियादी अधिकार है. जब कोई सरकार या उसके समर्थक युवाओं के भविष्य और शिक्षा को निशाना बनाने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि वे किसी विरोधी दल से नहीं, बल्कि शिक्षा और सोच से डरते हैं. राजनीतिक लड़ाई नीतियों पर लड़ी जाती है, विचारों पर लड़ी जाती है. लेकिन जब सत्ता के कारिंदे और उनके समर्थक परिवारों की आय और बच्चों की पढ़ाई में रोड़े अटकाने लगें, तो यह उनकी ताकत नहीं, बल्कि उनकी वैचारिक कंगाली को दर्शाता है. रील्स से देश नहीं चलता साहब, और न ही आरटीआई के जरिए युवाओं के हौसले तोड़े जा सकते हैं.




