By – वसीम रज़ा खान (वरिष्ठ पत्रकार – 9370170870)
भारत की बुनियादी शिक्षा प्रणाली का ढांचा सरकारी स्कूलों, जिला परिषद और नगर निगम के विद्यालयों पर टिका हुआ है. ये वे संस्थान हैं जहां देश के बहुसंख्यक मध्यमवर्ग और गरीब परिवारों के बच्चे अपने उज्ज्वल भविष्य का सपना बुनते हैं. परंतु, आज ये विद्यालय कुप्रबंधन, प्रशासनिक लापरवाही और लगातार बढ़ते भ्रष्टाचार के शिकार हो चुके हैं. इस स्थिति में तत्काल सुधार के लिए शिक्षा मंत्रालय को एक ऐतिहासिक फैसला लेते हुए एक स्वतंत्र बाहरी शिक्षा कमिटी का गठन करना चाहिए, जिसकी कार्यप्रणाली पूर्व में स्थापित स्कूल बोर्ड्स की तर्ज पर पारदर्शी और जन-केंद्रित हो.
सरकारी और स्थानीय निकायों द्वारा संचालित विद्यालयों की स्थिति आज चिंताजनक है. इन समस्याओं का सीधा असर छात्रों के भविष्य पर पड़ रहा है.
मध्याह्न भोजन की गुणवत्ता में गपला, बुनियादी ढांचे के बजट की हेराफेरी और पठन-पाठन की सामग्री के वितरण में धांधली आम बात हो चुकी है. योग्य शिक्षकों से पढ़ाने के बजाय गैर-शैक्षणिक कार्य करवाए जाते हैं. साथ ही, वेतन, स्थानांतरण और पदोन्नति के लिए उन्हें प्रशासनिक लालफीताशाही से जूझना पड़ता है. स्कूलों में पीने के पानी, शौचालय और स्वच्छ कक्षाओं जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है. शिकायत के लिए कोई पारदर्शी और प्रभावी तंत्र मौजूद नहीं है. केवल कागजी निरीक्षण होते हैं, जिनसे धरातल की सच्चाई कभी बाहर नहीं आ पाती. इन चुनौतियों से निपटने के लिए एक ऐसी बाहरी कमिटी की जरूरत है जिसमें शिक्षाविद, जागरूक नागरिक, सेवानिवृत्त शिक्षक और अभिभावक शामिल हों. यह कमिटी सीधे शिक्षा मंत्रालय के प्रति जवाबदेह होगी और इसे प्रशासनिक निगरानी का अधिकार मिलना चाहिए. जब एक स्वतंत्र बोर्ड या कमिटी स्कूलों के दैनिक कामकाज और फंड की जांच के साथ साथ छात्रों की जरुरतों और शिक्षकों से जुडे मामलों की निगरानी करेगी, तो भ्रष्टाचार की गुंजाइश खत्म होगी. कमिटी यह सुनिश्चित करेगी कि पाठ्यक्रम समय पर पूरा हो और पठन-पाठन का स्तर ऊंचा रहे, जिससे शिक्षा पर छात्रों और अभिभावकों का नियंत्रण बहाल होगा. यह कमिटी शिक्षकों की समस्याओं, शिकायतों और उनकी कार्यप्रणाली से जुड़ी बाधाओं को दूर कर उन्हें जनता का सहयोग और सम्मान दिलाएगी. शिक्षा मंत्रालय को इस दिशा में अविलंब कदम उठाना चाहिए. केवल बजट बढ़ा देने से स्थिति नहीं सुधरेगी; बजट का सही इस्तेमाल हो रहा है या नहीं, इसके लिए जन-भागीदारी बेहद जरूरी है. हम देश के सभी शिक्षाविदों, समाजसेवियों, शिक्षकों, अभिभावकों और जागरूक नागरिकों से अपील करते हैं कि वे इस मांग को जोर-शोर से उठाएं. जब तक शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही और बाहरी निगरानी लागू नहीं होगी, तब तक हमारे सरकारी स्कूलों की स्थिति नहीं बदलेगी. आइए, एक मजबूत और पारदर्शी शिक्षा प्रणाली के निर्माण के लिए एकजुट हों.




