By – Waseem Raza Khan
नासिक महानगर पालिका आयुक्त मनीषा खत्री (IAS) के दफ्तर में जब से कांच के एक बड़े बाउल में खड़ा सफेद नमक रखा गया है, तब से पूरे प्रशासनिक गलियारे का वातावरण अचानक ‘ऊर्जावान’ हो उठा है. कहा जाता है कि कांच के कटोरे में खड़ा नमक रखने से एक ऐसी दिव्य और अद्भुत सकारात्मक ऊर्जा पैदा होती है, जो बड़े-बड़े गुस्सैल और चिड़चिड़े लोगों का दिमाग चुटकियों में ठंडा कर देती है. लोग आते हैं, नमक को देखते हैं, और बहस तथा तकरार का इरादा त्यागकर शांति का मार्ग चुन लेते हैं.

लेकिन समाज से ‘अंधश्रद्धा’ मिटाने का बीड़ा उठाए अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति (अंनिस) के सदस्यों से यह चमत्कारी नजारा बर्दाश्त नहीं हुआ. वे तुरंत आयुक्त कार्यालय पहुँच गए और दफ्तर से नमक का कटोरा हटाने के लिए जमकर हो-हल्ला मचाने लगे. समिति का तर्क है कि एक आईएएस अधिकारी के दफ्तर में नमक का कटोरा रखने से समाज में अंधविश्वास फैलेगा. हालांकि, समिति के इस हो-हल्ले ने जाने-अनजाने में ही सही, नमक की उस कथित ‘सकारात्मक ऊर्जा’ पर ही मुहर लगा दी है. गौर कीजिए—जैसे ही समिति के लोग आयुक्त दफ्तर पहुँचे और उनकी नज़र उस सफेद नमक पर पड़ी, उनके भीतर भी अचानक एक ‘अद्भुत’ सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो गया! इसी ऊर्जा के प्रभाव में आकर वे तुरंत इतने ‘जागरूक’ और ‘सक्रिय’ हो गए कि नमक के उस प्याले को वहाँ से हटाने की बुलंद माँग कर डाली. यदि उस कटोरे में रखी ऊर्जा सचमुच इतनी असरदार न होती, तो अंनिस के सदस्य इतने ऊर्जावान होकर यह विरोध कैसे दर्ज करा पाते? यह उस सफेद खड़े नमक की करामात ही तो है, जिसने निष्क्रिय पड़ी समिति में एकदम से ‘सकारात्मक क्रियाशीलता’ भर दी! अब इसे सकारात्मक ऊर्जा की ताकत नहीं कहेंगे तो और क्या कहेंगे?
वैसे, प्रशासनिक और सामाजिक व्यवस्था के लिए यह नमक काफी काम का साबित हो सकता है. अगर महज़ एक बाउल नमक दफ्तर में रखने से नकारात्मकता दूर होती है, तो हो सकता है बरसों से धूल फाँक रही सरकारी फाइलें भी ‘सकारात्मक ऊर्जा’ पाकर खुद-ब-खुद आगे खिसकने लगें. जब दफ्तर के झगड़े और तकरार सुलझाने के लिए किसी मध्यस्थता या सुरक्षा की जरूरत ही न पड़े और सारा काम केवल खड़े नमक से ही हो जाए, तो प्रशासन के करोड़ों रुपये बच सकते हैं. अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति को भी बैठे-बिठाए एक नया मुद्दा और ऊर्जा मिल गई, वरना इस भागदौड़ भरी जिंदगी में ऐसे ‘नमकीन’ मौके कहाँ मिलते हैं! सार यही है कि चाय में भले ही थोड़ा नमक कम चले, लेकिन प्रशासनिक दफ्तरों में सकारात्मक ऊर्जा का यह ‘नमकीन तड़का’ चर्चा का विषय जरूर बन गया है. अब देखना यह है कि यह ‘सकारात्मक नमक’ दफ्तर में टिका रहता है या अंनिस का विरोध इसे घोलकर बहा देता है!




