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सांप्रदायिकता की भेंट चढ़ता कॉर्पोरेट कल्चर

Article by Waseem Raza Khan

नासिक में हाल ही में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) के एक कर्मचारी से जुड़ा मामला सामने आया, जिसने न केवल शहर के सामाजिक ताने-बाने को झकझोरा है, बल्कि भारत के कॉर्पोरेट जगत की सुरक्षा और निष्पक्षता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. नासिक स्थित TCS के एक मुस्लिम कर्मचारी और उसकी हिंदू सहकर्मी के बीच कथित प्रेम संबंधों को लेकर यह विवाद शुरू हुआ. जिसे एक निजी आपसी सहमति का रिश्ता होना चाहिए था, उसे स्थानीय दक्षिणपंथी संगठनों और कुछ राजनीतिक तत्वों ने तुरंत ‘लव जिहाद’ का रंग दे दिया. बिना किसी कानूनी जांच या ठोस सबूत के, इसे एक सोची-समझी साजिश के रूप में पेश किया गया. इस पूरे मामले में स्थानीय भाजपा नेताओं और हिंदू संगठनों की सक्रियता ने इसे एक सरकारी और राजनीतिक मिशन की तरह बना दिया. आरोप है कि स्थानीय नेताओं ने पुलिस और प्रशासन पर दबाव बनाकर इसे सांप्रदायिक मोड़ दिया. विरोध प्रदर्शनों का उद्देश्य न्याय से ज्यादा मुसलमानों को मानसिक और सामाजिक रूप से सताना प्रतीत हुआ. सत्ताधारी दल के नेताओं की भागीदारी ने यह संदेश दिया कि निजी जीवन में भी अब धार्मिक ध्रुवीकरण हावी रहेगा.
मुख्यधारा के मीडिया और स्थानीय सोशल मीडिया हैंडल्स ने इस मामले में अग्नि में घी डालने का काम किया. बिना दोनों पक्षों की बात सुने, मीडिया ने एकतरफा नैरेटिव चलाया. रिपोर्टिंग में तथ्यों की जगह भावनाओं और उकसावे वाली भाषा का प्रयोग किया गया, जिससे एक सामान्य कर्मचारी को अपराधी की तरह पेश किया गया और पूरे समुदाय को संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया गया. इस घटना का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि अब कॉर्पोरेट सेक्टर को भी सांप्रदायिकता का अखाड़ा बनाया जा रहा है. यदि इस तरह के दबाव से कंपनियों में नियुक्तियां प्रभावित होती हैं, तो मुस्लिम बेरोजगार युवाओं के लिए निजी क्षेत्र के दरवाजे बंद हो सकते हैं. आमतौर पर कॉर्पोरेट कंपनियां अपनी ‘डायवर्सिटी और इंक्लूजन’ नीतियों के लिए जानी जाती हैं, लेकिन अगर वे राजनीतिक दबाव में भेदभाव करने लगीं, तो यह उनकी प्रतिष्ठा और कार्यक्षमता दोनों के लिए घातक होगा. इस तरह के सांप्रदायिक हस्तक्षेप से देश को दूरगामी नुकसान हो सकते हैं. यदि कार्यस्थल पर धर्म के आधार पर असुरक्षा बढ़ती है, तो उच्च शिक्षित और एक्सपर्ट कर्मचारी भारत छोड़ने या ऐसे शहरों से दूरी बनाने पर मजबूर होंगे. ‘लव जिहाद’ के नाम पर की जाने वाली मॉरल पुलिसिंग से कामकाजी महिलाएं और लड़कियां असुरक्षित महसूस करेंगी. इससे उनके करियर और स्वतंत्रता पर अंकुश लगेगा. विदेशी कंपनियां ऐसे देशों में निवेश करने से कतराती हैं जहां सामाजिक अस्थिरता हो और कार्यस्थल पर भेदभाव का माहौल हो. नासिक का TCS मामला केवल एक प्रेम संबंध का विवाद नहीं है, बल्कि यह भारत के लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष ढांचे पर प्रहार है. यदि इसी तरह निजी मामलों को सांप्रदायिक रंग देकर कॉर्पोरेट जगत को निशाना बनाया गया, तो भारत वैश्विक मंच पर अपनी विश्वसनीयता खो देगा. हम देश को एक ऐसी खाई की ओर धकेल रहे हैं जहां विकास और प्रगति की जगह केवल नफरत और विभाजन होगा. जरूरत इस बात की है कि कानून अपना काम करे और कॉर्पोरेट संस्थानों को राजनीति से मुक्त रखा जाए.
किसी भी प्रगतिशील समाज की नींव सहिष्णुता, तर्क और आपसी विश्वास पर टिकी होती है. नासिक की घटना हमें आगाह करती है कि यदि हम अपनी सोच को नफरत के हवाले कर देंगे, तो नुकसान किसी एक समुदाय का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र का होगा. आज के डिजिटल युग में सूचनाएं आग की तरह फैलती हैं, लेकिन उनमें सत्यता कम और एजेंडा ज्यादा होता है. समाज के हर नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह किसी भी घटना को सांप्रदायिक चश्मे से देखने के बजाय तथ्यों की जांच करे. कानून को अपने हाथ में लेना न्याय नहीं, बल्कि अराजकता है. भारत एक युवा देश है. हमारे युवाओं की ऊर्जा इनोवेशन, तकनीक और शिक्षा में लगनी चाहिए. यदि हम उन्हें धर्म और नफरत की दीवारों में उलझा देंगे, तो हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार करेंगे जो दुनिया से प्रतिस्पर्धा करने के बजाय आपस में ही लड़ती रहेगी. कॉर्पोरेट जगत में योग्यता ही एकमात्र पैमाना होना चाहिए. संविधान हमें अपनी पसंद से जीने का अधिकार देता है. समाज को यह समझना होगा कि दो वयस्कों के निजी निर्णयों को राजनीतिक मुद्दा बनाना न केवल अनैतिक है, बल्कि यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन भी है. जब हम दूसरों की स्वतंत्रता का सम्मान करेंगे, तभी हमारी अपनी स्वतंत्रता सुरक्षित रहेगी. राजनीतिक दल अपने हितों के लिए समुदायों के बीच दरार पैदा कर सकते हैं, लेकिन उस दरार को भरने की जिम्मेदारी आम नागरिक की है. हमें ऐसे नेतृत्व और ऐसी विचारधारा को बढ़ावा देना चाहिए जो जोड़ने का काम करे, तोड़ने का नहीं. नफरत की आग में झुलसकर किसी का घर रोशन नहीं होता. आइए, हम एक ऐसा समाज बनाएं जहां पहचान धर्म से नहीं, बल्कि हमारे कर्मों और हमारी भारतीयता से हो. आपसी भाईचारा ही वह एकमात्र रास्ता है जो भारत को एक विश्व गुरु और विकसित राष्ट्र बना सकता है. हमें तय करना है कि हम आने वाली पीढ़ी को एक समृद्ध भारत सौंपना चाहते हैं या नफरत से बंटा हुआ समाज.

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