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सत्ता का शक्ति प्रदर्शन या जनता का शोषण? वर्ली की सड़क पर दर्द की चींख

Article by WASEEM RAZA KHAN

मुंबई के वर्ली में बीते कल जो दृश्य देखने को मिला, वह आधुनिक भारत की राजनीति के उस कड़वे सच को उजागर करता है जहां जनता की सेवा का नारा देने वाले ही जनता की परेशानी का सबब बन जाते हैं. एक महिला का घंटों ट्रैफिक में फंसे रहना और अंततः कैबिनेट मंत्री गिरीश महाजन को ‘गेट आउट’ कह देना, कोई साधारण गुस्सा नहीं है. यह उस आम नागरिक की चीख है जो सत्ताधारियों के खोखले शक्ति प्रदर्शन के नीचे दब रहा है. यह बेहद हास्यास्पद और विडंबनापूर्ण है कि जिस दल की सरकार केंद्र से लेकर राज्य तक है, वह अपनी ही विफलताओं को छिपाने के लिए सड़कों पर मोर्चा निकाल रही है. भाजपा का यह ‘विरोध मोर्चा’ उस महिला आरक्षण विधेयक के नाम पर था, जिसे पास कराने की पूरी जिम्मेदारी और शक्ति उन्हीं के पास थी लेकिन वे विफल रहे. सवाल यह उठता है कि यदि आपके पास बहुमत है, यदि आपके पास सत्ता है, तो आप सड़कों पर किसे चुनौती दे रहे हैं? क्या यह विपक्ष से डर है या अपनी अक्षमता को छिपाने का एक नाटक? भाजपा आज महिलाओं की हमदर्द बनने की कोशिश कर रही है, लेकिन इतिहास गवाह है कि महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई तब शुरू हुई थी जब भाजपा का नामो-निशान तक नहीं था. महिलाओं को समान अधिकार देने की नींव आजादी के आंदोलन के दौरान ही रख दी गई थी जो मोतीलाल नेहरू और कांग्रेस की विरासत है. स्थानीय निकायों में महिलाओं को 33% आरक्षण कांग्रेस के शासनकाल में मिला. उस दौर में यही दक्षिणपंथी विचारधाराएं थीं जो प्रगतिशील सुधारों के आड़े आती थीं. कल तक जिस विधेयक का भाजपा ने विरोध किया, आज उसी के नाम पर सड़कों को जाम कर रही है. यह केवल सहानुभूति बटोरने की एक चाल है. वर्ली में जिस तरह सैकड़ों पुलिसकर्मियों और गाड़ियों के काफिले ने आम जनता का जीवन ठप कर दिया, वह भाजपा की प्राथमिकताएं दर्शाता है. जो नेता आम महिला को दफ्तर या घर समय पर पहुंचने का रास्ता नहीं दे सकते, वे उनके अधिकारों की रक्षा क्या करेंगे? आज देश की महिलाओं को यह सोचना होगा कि जो नेता अपना घर और अपनी जिम्मेदारियां सही ढंग से नहीं निभा पा रहे, वे महिलाओं के सशक्तिकरण के बारे में इतने बेचैन क्यों हैं? क्या यह वाकई आपके हक की लड़ाई है, या आगामी चुनावों के लिए बुना गया एक जाल? विपक्ष (कांग्रेस) के तीखे हमलों से बौखलाई भाजपा अब सड़कों पर उतरकर यह जताना चाहती है कि वह सक्रिय है. लेकिन सच तो यह है कि यह सक्रियता केवल जनता को परेशान करने वाली है. वर्ली की उस महिला ने गिरीश महाजन को जो आईना दिखाया, वह पूरे देश की महिलाओं की आवाज है. सत्ता में बैठकर सड़कों को जाम करना वीरता नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता है. यदि भाजपा वाकई महिलाओं का भला चाहती है, तो उसे सड़कों पर तमाशा करने के बजाय संसद में काम करना चाहिए और जनता को बुनियादी सुविधाएं (जैसे ट्रैफिक मुक्त सड़कें) प्रदान करनी चाहिए. मोर्चे पर एक हिम्मल वाली महिला की चींखें सत्ता की विफलता पर जोरदार तमांचा है. इस प्रकार की बदनामी होने के बाद विफल सत्ताधारियों को अपने पद छोड देने चाहिएं. महिलाओं की चिंता करने वाले मंत्री को एक गुस्साई महिला अगर गेट आऊट कहती है तो ऐसे मंत्री को भी अपने भीतर की जांच करनी चाहिये और सत्ता को समझ लेना चाहिए जनता नाटकों को समझती है.

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