Article by WASEEM RAZA KHAN
महाराष्ट्र का ‘मिनी आईटी हब’ कहा जाने वाला नासिक इन दिनों सुर्खियों में है, लेकिन वजह कोई तकनीकी विकास नहीं, बल्कि धर्म और राजनीति के बीच फंसी न्याय की दोहरी परिभाषा है. पिछले एक महीने से नासिक अशोक खरात कांड की गूंज से थर्रा रहा है, जहां एक स्वयंभू बाबा ने सैकड़ों हिंदू महिलाओं की अस्मत के साथ खिलवाड़ किया. लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि इस कांड पर हिंदू गौरव की दुहाई देने वाली भाजपा और उसके समर्थकों के मुंह पर ताले जड़े रहे. अब एक मल्टीनेशनल कंपनी में सामने आए कथित लव जिहाद के मामले को लेकर यही संगठन अपनी मर्दानगी का सबूत सड़कों पर गला फाड़कर दे रहे हैं. अशोक खरात का मामला किसी एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है. आरोपों के मुताबिक, इस ढोंगी बाबा ने धर्म की आड़ में महिलाओं का न केवल आर्थिक बल्कि भीषण यौन शोषण भी किया. जब पीड़ित महिलाएं हिंदू समाज से थीं और आरोपी भी उसी धर्म से था, तब भाजपा और उसके सहयोगी संगठनों के आंदोलनकारी तेवर कहीं नजर नहीं आए. क्या भाजपा के लिए किसी हिंदू महिला की गरिमा तभी मायने रखती है जब आरोपी किसी दूसरे धर्म का हो? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि खरात के खिलाफ मोर्चा न निकालना यह दर्शाता है कि पार्टी के लिए अपराध से ज्यादा आरोपी का नाम मायने रखता है. हाल ही में नासिक की एक नामी कंपनी में मुस्लिम युवकों पर लड़कियों को प्रेम जाल में फंसाने और धर्मांतरण का दबाव बनाने के आरोप लगे हैं. जहां एक तरफ भाजपा नेता इसे लव जिहाद का बड़ा नेटवर्क बता रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर चर्चाएं कुछ और ही कहानी बयां कर रही हैं. चर्चा है कि मामला एक शादीशुदा महिला और मुस्लिम युवक के बीच प्रेम संबंधों का था, जहां युवक महिला को उसके पति को छोड़ने से मना कर रहा था. उसने खरात की तरह किसी की इज्जत नीलाम नहीं की, बल्कि संबंधों की मर्यादा बनाए रखने की कोशिश की. लेकिन, तथ्यों की जांच किए बिना ही भाजपा कार्यकर्ताओं का सड़कों पर उतरना यह साफ करता है कि उनका उद्देश्य न्याय दिलाना कम और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करना ज्यादा है. खरात कांड पर खामोश रहने वाले नेताओं का अचानक MNC मामले में जोश में आना उनकी राजनीति की पोल खोलता है. यह दोहरा रवैया समाज के लिए घातक है. राजनीतिक दल महिलाओं की सुरक्षा को केवल एक चुनावी टूल की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं. खरात जैसे दरिंदों पर पर्दा डालने के लिए लव जिहाद जैसे नैरेटिव को हवा देना एक सोची-समझी रणनीति लगती है. बिना सबूत किसी समुदाय को टारगेट करना नासिक जैसे प्रगतिशील शहर की शांति और भाईचारे को नुकसान पहुंचा रहा है. न्याय अंधा होना चाहिए, धर्म के आधार पर भेदभाव करने वाला नहीं. यदि अशोक खरात के कुकर्मों पर भाजपा के मुंह में दही जमा था, तो आज MNC मामले पर उनका चिल्लाना किसी मर्दानगी का नहीं बल्कि वैचारिक दिवालियेपन का सबूत है. नासिक की जनता देख रही है कि किसके लिए ‘बेटी बचाओ’ केवल एक नारा है और किसके लिए राजनीति का जरिया.
सवाल यह है कि क्या एक हिंदू अपराधी द्वारा की गई दरिंदगी कम दर्दनाक होती है, जो उस पर खामोशी अख्तियार कर ली गई? जनता को इस चयनात्मक न्याय के पीछे छिपी नफरत को पहचानना होगा.

अशोक खरात प्रकरण में आरोप बेहद गंभीर थे. समाज के एक वर्ग की महिलाओं के साथ कथित शोषण और धोखाधड़ी जैसे मुद्दे सामने आए, लेकिन इस मामले पर न तो बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन हुए, न ही राजनीतिक मंचों से तीखी प्रतिक्रियाएं सुनाई दीं. खासकर भारतीय जनता पार्टी और उससे जुड़े नेताओं की चुप्पी ने कई सवाल खड़े किए. आमतौर पर नैतिकता और महिला सुरक्षा के मुद्दों पर मुखर रहने वाले ये नेता इस बार असहज रूप से शांत क्यों रहे? इसके विपरीत, जैसे ही एक निजी कंपनी में कुछ मुस्लिम युवकों पर आरोप लगाए गए कि वे महिला सहकर्मियों को प्रेम जाल में फंसाकर उनका शोषण करते हैं और धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर करते हैं, माहौल अचानक गरमा गया. बिना पूरी जांच और ठोस प्रमाणों के, लव जिहाद का नैरेटिव तेजी से फैलाया गया. राजनीतिक बयानबाजी, सोशल मीडिया अभियान और विरोध प्रदर्शनों ने इस मुद्दे को हवा दी. समुदाय के कई लोगों ने इन आरोपों को बेबुनियाद बताया है और इसे एकतरफा कहानी करार दिया है. चर्चाओं में यह भी सामने आया कि संबंधित मामला आपसी सहमति और व्यक्तिगत संबंधों से जुड़ा हो सकता है, जिसमें जटिल मानवीय पहलू हैं. ऐसे मामलों को सांप्रदायिक रंग देना न केवल न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करता है, बल्कि समाज में अविश्वास और विभाजन भी बढ़ाता है. यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है—क्या अपराध का मूल्यांकन आरोपी की पहचान के आधार पर किया जाना चाहिए? अगर एक व्यक्ति, चाहे वह किसी भी धर्म या समुदाय से हो, महिलाओं के साथ अपराध करता है, तो उसके खिलाफ समान रूप से सख्त कार्रवाई होनी चाहिए. लेकिन जब एक मामले में चुप्पी और दूसरे में अत्यधिक आक्रामकता दिखाई देती है, तो यह न्याय नहीं बल्कि राजनीतिक सुविधा का संकेत देता है. भारतीय जनता पार्टी और उससे जुड़े संगठनों के लिए यह आत्ममंथन का समय है. यदि वे वास्तव में महिला सुरक्षा और न्याय के पक्षधर हैं, तो उन्हें हर मामले में समान संवेदनशीलता और सक्रियता दिखानी होगी—चाहे आरोपी कोई भी हो. चयनात्मक आक्रोश न केवल उनकी विश्वसनीयता को कमजोर करता है, बल्कि समाज में खतरनाक ध्रुवीकरण को भी जन्म देता है.
नासिक जैसे शहर, जो तकनीकी और सामाजिक प्रगति की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, उन्हें इस तरह की राजनीति से बचाने की जरूरत है. न्याय और सच्चाई को प्राथमिकता देने के बजाय अगर नैरेटिव गढ़े जाएंगे, तो इसका खामियाजा पूरे समाज को भुगतना पड़ेगा.
अंततः, यह समय है कि हम सवाल पूछें—क्या हम सच में न्याय चाहते हैं, या सिर्फ अपने-अपने पक्ष को सही साबित करने की होड़ में लगे हैं?




