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लोकतंत्र की ‘डमी’ संस्कृति – महिला आरक्षण का अपमान और ‘जेरॉक्स’ नेताओं का उदय

By – Waseem Raza Khan

लोकसभा, विधानसभा, महानगर पालिका और स्थानीय निकाय चुनावों में ‘आरक्षित सीटों’ का दुरुपयोग एक गंभीर लोकतांत्रिक समस्या बन गया है. जेरॉक्स नेता या सरपंच-पति/कॉर्पोरेटर-पति का मुद्दा न केवल संविधान की भावना का अपमान है, बल्कि महिला सशक्तिकरण के नाम पर जनता के साथ एक धोखा भी है. भारतीय लोकतंत्र में स्थानीय निकायों (पालिकाओं, महानगर पालिका, जिला परिषद) से लेकर लोकसभा और विधानसभा तक महिला आरक्षण का उद्देश्य महिलाओं को निर्णय लेने की प्रक्रिया में भागीदार बनाना था. लेकिन आज देश की राजनीति में एक खतरनाक चलन शुरू हो गया है जिसे प्रॉक्सी पॉलिटिक्स कहा जाता है. यहां महिला केवल नाम की उम्मीदवार होती है, जबकि सत्ता की असली कमान उसके पति के हाथ में होती है, जिसे जनता अब ‘जेरॉक्स नेता’ के नाम से पुकारने लगी है.
संविधान के 73वें और 74वें संशोधन ने महिलाओं को 50% आरक्षण देकर शक्ति दी थी. लेकिन जमीन पर नजारा अलग है. चुनाव घोषित होते ही कई ‘दिग्गज’ पुरुष नेता अपनी उन पत्नियों को मैदान में उतार देते हैं, जिनका राजनीति, समाज सेवा या प्रशासन से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं होता.
यह केवल एक सीट जीतने का जुगाड़ है, महिला सशक्तिकरण नहीं. ऐसी महिलाएं जीत तो जाती हैं, लेकिन सदन में वे केवल एक मूक दर्शक बनकर रह जाती हैं. उनके हिस्से का भाषण, उनकी योजनाएं और उनके निर्णय गैलरी में बैठे उनके ‘जेरॉक्स पति’ तय करते हैं. इस ‘डमी’ राजनीति की पराकाष्ठा तब देखने को मिली जब बिहार विधानसभा के भीतर एक निर्वाचित महिला विधायक, जो एक प्रभावशाली राजनीतिक परिवार से आती हैं, संविधान की शपथ तक ठीक से नहीं पढ़ पाईं. यह दृश्य लोकतंत्र के लिए अत्यंत पीड़ादायक था. जिस विधायक को राज्य की जनता के लिए कानून बनाने हैं, बजट पर चर्चा करनी है और जटिल प्रशासनिक मुद्दों को सुलझाना है, वह अगर दो लाइनों की शपथ के लिए भी दूसरों के इशारों और शब्दों पर निर्भर है, तो वह जनता का प्रतिनिधित्व क्या करेगी? यह साबित करता है कि उसे उम्मीदवार केवल इसलिए बनाया गया क्योंकि वह सीट महिला आरक्षित थी और उसके पति या परिवार को अपनी सत्ता बरकरार रखनी थी. प्रशासनिक रूप से, किसी भी निर्वाचित प्रतिनिधि की जगह उसका पति या रिश्तेदार कामकाज नहीं संभाल सकता. यदि कोई पति खुद को ‘सपोर्टिंग कॉर्पोरेटर’ कहकर फाइलों पर हस्ताक्षर करता है या मीटिंग में बैठता है, तो यह IPC की विभिन्न धाराओं और नगर पालिका अधिनियम का सीधा उल्लंघन है. ऐसे झेरॉक्स नेताओं के कारण वार्ड या निर्वाचन क्षेत्र का विकास रुक जाता है, क्योंकि प्रतिनिधि को खुद नहीं पता होता कि ‘फंड’ क्या है और ‘नियम’ क्या हैं. जनता को समझना होगा कि वे किसी व्यक्ति को नहीं, बल्कि अपने क्षेत्र के भविष्य को चुन रहे हैं. क्या आपकी महिला उम्मीदवार स्वतंत्र रूप से अपनी बात रख सकती है? क्या उसका अपना कोई विजन या ब्लूप्रिंट है? जो महिला उम्मीदवार प्रचार के दौरान भी अपने पति के पीछे घूंघट या पर्दे में खड़ी रहती है, वह सदन में आपके अधिकारों के लिए कभी नहीं लड़ पाएगी. झेरॉक्स राजनीति लोकतंत्र के शरीर में लगा एक ऐसा कैंसर है जो महिला नेतृत्व की जड़ों को खोखला कर रहा है. यह उन सक्षम और पढ़ी-लिखी महिलाओं का भी रास्ता रोकता है जो वाकई समाज में बदलाव लाना चाहती हैं. मतदाताओं को चाहिए कि वे ऐसी ‘डमी’ उम्मीदवारी का कड़ा विरोध करें और केवल उन्हें ही चुनें जिनमें नेतृत्व करने का साहस और ज्ञान हो. चुनाव केवल एक बटन दबाने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि अपने भविष्य को सुरक्षित करने का निर्णय है. जनता को इस बारे में कुछ बारीकियों पर ध्यान देना चाहिए कि क्या महिला उम्मीदवार को वार्ड या शहर की समस्याओं की जानकारी है? क्या वह बिना किसी ‘सहारे’ के मंच पर बोल सकती है? केवल किसी की पत्नी होने के नाते वोट न दें. यह देखें कि क्या उम्मीदवार का अपना कोई विजन या विकास का मॉडल है. यदि चुनाव प्रचार के दौरान पति ही हर जगह बात कर रहा है और महिला उम्मीदवार पीछे खड़ी है, तो समझ लीजिए कि भविष्य में आपका प्रतिनिधि कौन होगा. महिला आरक्षण का अर्थ महिलाओं को ‘रबर स्टैंप’ बनाना नहीं, बल्कि उन्हें नेतृत्व सौंपना था. जब तक डमी कॉर्पोरेटर पति जैसी असंवैधानिक प्रथाएं समाज में गौरव का विषय बनी रहेंगी, तब तक लोकतंत्र केवल कागजों पर ही रहेगा. यह समय है कि प्रशासन और जनता मिलकर इन ‘प्रॉक्सी’ नेताओं का बहिष्कार करें और सही अर्थों में महिला नेतृत्व को सशक्त बनाएं.
ऐसे में कई सवाल पैदा होते हैं कि क्या यह मतदाता का अपमान नहीं है? जिस जनता ने इस उम्मीद में वोट दिया कि उनकी प्रतिनिधि उनकी आवाज उठाएगी, क्या उसे पता था कि उसकी प्रतिनिधि खुद अपनी आवाज के लिए दूसरों की मोहताज है?
पार्टी की नैतिकता कहां है? राजनीतिक दल केवल ‘जीतने की क्षमता’ देखते हैं, लेकिन क्या उम्मीदवार की ‘योग्यता’ का कोई पैमाना नहीं होना चाहिए? विधानसभा जैसे उच्च सदन में ऐसी घटनाओं से राज्य की छवि धूमिल होती है और यह संदेश जाता है कि यहां योग्यता नहीं, बल्कि ‘पारिवारिक विरासत’ मायने रखती है.

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