By – Waseem Raza Khan
मालेगांव की राजनीति ने न केवल महाराष्ट्र बल्कि पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है। Indian Secular Largest Assembly of Maharashtra (ISLAM) पार्टी का उदय भारतीय राजनीति में एक नई करवट का संकेत है।
भारतीय राजनीति में जब भी किसी नई शक्ति का उदय होता है, तो स्थापित व्यवस्थाएं और पक्षपाती मीडिया उसे संदिग्ध नजरों से देखने लगता है। मालेगांव महानगर पालिका के चुनावों में Indian Secular Largest Assembly of Maharashtra (ISLAM) पार्टी की शानदार जीत ने भी कुछ ऐसा ही तूफान खड़ा कर दिया है। पूर्व विधायक आसिफ शेख के नेतृत्व में इस पार्टी ने न केवल स्थानीय समीकरण बदले हैं, बल्कि दिल्ली और मुंबई के राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है।
मालेगांव में जहाँ सालों से आल इंडिया मजलिस इत्तेहादुल मुसलिमीन और विधायक मुफ्ती मोहम्मद इस्माइल का दबदबा माना जाता था, वहाँ आसिफ शेख की ‘इस्लाम’ पार्टी ने अपनी जड़ें जमा ली हैं। महाराष्ट्र की 29 महानगरपालिकाओं में AIMIM के करीब 125 पार्षदों की जीत के शोर के बीच, मालेगांव में उसका केवल 21 सीटों पर सिमट जाना एक बड़े बदलाव का संकेत है। जनता ने स्पष्ट कर दिया है कि वह केवल नारों के पीछे नहीं, बल्कि ठोस विकल्प और स्थानीय जुड़ाव के पीछे खड़ी है। सपा के साथ गठबंधन और कांग्रेस के समर्थन ने यह साबित कर दिया कि आसिफ शेख केवल एक समुदाय की बात नहीं कर रहे, बल्कि वे एक सेक्युलर गठबंधन बनाने में सफल रहे हैं।
दुखद पहलू यह है कि मुख्यधारा के मीडिया का एक वर्ग (जिसे अक्सर गोदी मीडिया कहा जाता है) पार्टी के नाम के शॉर्ट फॉर्म ‘ISLAM’ को लेकर कट्टरवाद और ‘राजनीतिक जिहाद’ जैसे भ्रामक शब्द गढ़ रहा है। यह न केवल असंवैधानिक है बल्कि एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए खतरनाक भी है। आसिफ शेख ने स्पष्ट रूप से कहा है कि “हमारा एजेंडा केवल सेक्युलरिज्म है। हम धर्मनिरपेक्ष हैं और सभी धर्मों को साथ लेकर चलने की मंशा रखते हैं।”
जब किसी पार्टी के नाम में ‘majlis’, ‘शिव’ या ‘अकाली’ हो सकता है, तो ‘इस्लाम’ (Indian Secular Largest Assembly of Maharashtra) शब्द से आपत्ति क्यों? यह नाम पार्टी की पहचान और महाराष्ट्र के प्रति उसकी निष्ठा को दर्शाता है, न कि किसी के खिलाफ नफरत को।
मुसलमान दशकों से कांग्रेस के साथ एक ‘मजबूरी के रिश्ते’ में बंधे थे। AIMIM के उदय ने उम्मीद तो जगाई, लेकिन निरंतर “भाजपा की बी टीम” होने के आरोपों और कुछ विवादास्पद नीतियों ने आम मुस्लिम मतदाता को असमंजस में डाल दिया। ऐसे में आसिफ शेख की पार्टी एक तीसरे विकल्प के रूप में उभरती दिख रही है। यह पार्टी कट्टरवाद के बजाय अधिकारों की बात कर रही है और क्षेत्रीय जुड़ाव पर जोर दे रही है। ‘इस्लाम’ पार्टी के लिए सफलता का अगला पायदान केवल मालेगांव नहीं, बल्कि पूरा महाराष्ट्र और भारत होना चाहिए। इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम आवश्यक हैं जैसे
नीतियों में स्पष्टता: पार्टी को AIMIM की भावनात्मक राजनीति से इतर शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दों पर अपना विजन पेश करना होगा।
साझा संस्कृति का प्रचार: मीडिया द्वारा फैलाए गए भ्रम को तोड़ने के लिए पार्टी को अपनी सेक्युलर छवि को और मुखर करना होगा, ताकि गैर-मुस्लिम मतदाता भी जुड़ सकें।
संगठन का विस्तार: मालेगांव की जीत को एक केस स्टडी बनाकर इसे राज्य के अन्य हिस्सों में ले जाना होगा।
मालेगांव की जनता ने एक नई इबारत लिख दी है। यदि ‘इस्लाम’ पार्टी अपनी इस साख को बचाए रखती है और सांप्रदायिक हमलों का जवाब अपने विकास कार्यों और समावेशी राजनीति से देती है, तो वह दिन दूर नहीं जब देश का मुसलमान एक विश्वसनीय और सशक्त नेतृत्व की तलाश को इस मंच पर पूरा होते देखेगा।




