By – Waseem Raza Khan
भारत में चुनाव उत्सव की तरह मनाए जाते हैं, लेकिन इस उत्सव के पीछे एक स्याह हकीकत छिपी है. रैलियों में उमड़ने वाली लाखों की भीड़ अक्सर विचारधारा से प्रेरित न होकर, ‘दिहाड़ी’ से संचालित होती है. यह विडंबना ही है कि जो हाथ देश का भविष्य गढ़ने के लिए होने चाहिए, वे चंद सौ रुपयों और एक वक्त के भोजन के लिए राजनेताओं के झंडे ढो रहे हैं.
राजनीति अब सेवा नहीं, बल्कि एक ‘बिजनेस मॉडल’ बन चुकी है. चुनाव में जुटने वाली भीड़ अब ‘इवेंट मैनेजमेंट’ और ‘भीड़ के ठेकेदारों’ के जरिए आती है. बेरोजगार युवाओं और गरीब महिलाओं को केवल एक ‘विजुअल एसेट’ की तरह इस्तेमाल किया जाता है ताकि टीवी कैमरों और सोशल मीडिया पर शक्ति प्रदर्शन किया जा सके. यदि जनता शिक्षित, संपन्न और रोजगारयुक्त हो जाएगी, तो वह चिलचिलाती धूप में किसी नेता के लिए पांच घंटे इंतजार नहीं करेगी. इसलिए, गरीबी का बने रहना कुछ राजनेताओं के लिए एक राजनीतिक जरूरत बन गया है.
चुनाव के दौरान कुछ दिनों के लिए मिलने वाला मुफ्त भोजन, शराब और नकद राशि, उस व्यक्ति के अगले पांच सालों के शोषण की अग्रिम किश्त होती है. जो नेता अपनी रैली में भीड़ खरीदने के लिए करोड़ों खर्च करता है, वह जीतने के बाद सबसे पहले उस ‘निवेश’ को सूद समेत वसूलने की योजना बनाता है, न कि जनता के लिए अस्पताल या स्कूल बनाने की. भारतीय कानून और चुनाव संहिता के तहत रैलियों में भीड़ जुटाने के लिए पैसे देना और प्रलोभन देना पूरी तरह अवैध है. आदर्श आचार संहिता चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार, मतदाताओं को किसी भी तरह का प्रलोभन (नकद, उपहार, शराब या भोजन) देना भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है. भारतीय दंड संहिता और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 कि धारा 123 (जनप्रतिनिधित्व अधिनियम) के तहत मतदाताओं को रिश्वत देना एक भ्रष्ट आचरण माना जाता है. यदि यह सिद्ध हो जाए, तो नेता का चुनाव रद्द किया जा सकता है. IPC की धारा 171B के तहत किसी को वोट देने या चुनावी गतिविधि में शामिल होने के लिए रिश्वत देना या लेना अपराध है, जिसमें कारावास और जुर्माने का प्रावधान है. चुनाव आयोग प्रत्येक उम्मीदवार के लिए खर्च की एक सीमा तय करता है. रैलियों में भीड़ लाने के लिए गाड़ियों का किराया, लाउडस्पीकर और भोजन का खर्च उम्मीदवार के खाते में जुड़ना चाहिए. अक्सर नेता इन खर्चों को छुपाने के लिए ब्लैक मनी का उपयोग करते हैं.
समाज के लिए संदेश: भीड़ नहीं, नागरिक बनें
गरीब और जरूरतमंद वर्ग को यह समझना होगा कि चुनाव के समय मिलने वाले 500 रुपये, उनके बच्चों के भविष्य की चोरी है. आपका वोट एक दिन की दिहाड़ी नहीं, बल्कि आपके आने वाले 5 साल की सुख-सुविधाओं का आधार है. जो लोग समाज के युवाओं को रैलियों में ले जाने का सौदा करते हैं, वे समाज के सबसे बड़े दुश्मन हैं. जिंदाबाद के नारे लगाने के बजाय, नेताओं से रोजगार के रोडमैप पर सवाल पूछना शुरू करें. लोकतंत्र तब तक सफल नहीं होगा जब तक ‘भीड़’ का हिस्सा बनने वाला व्यक्ति ‘सचेत नागरिक’ नहीं बन जाता. जब तक जनता अपनी गरीबी और लाचारी को बिकने के लिए बाजार में उपलब्ध रखेगी, राजनेता उन्हें इसी तरह खरीदते रहेंगे. अपना भविष्य संवारने के लिए झंडा नहीं, बल्कि अपनी आवाज बुलंद करने की जरूरत है.




