By – Waseem Raza Khan
हाल ही में ‘लल्लनटॉप’ पर सौरव द्विवेदी द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रम Does God Exist? ने डिजिटल मीडिया की नैतिकता और उसके पीछे छिपे कथित एजेंडे पर नई बहस छेड़ दी है. जावेद अख्तर और मुफ्ती शमाईल नदवी के बीच हुई इस बहस को कई विश्लेषक केवल एक ‘दार्शनिक चर्चा’ नहीं, बल्कि समाज में दरारें पैदा करने की एक गहरी साजिश के रूप में देख रहे हैं. आलोचकों का तर्क है कि जब विषय ‘ईश्वर का अस्तित्व’ था, तो तार्किक रूप से जावेद अख्तर (जो एक घोषित नास्तिक हैं) के सामने किसी सनातनी विद्वान या बहुसंख्यक समाज के दार्शनिक को होना चाहिए था. लेकिन जानबूझकर एक ‘मुफ्ती’ का चुनाव करना यह दर्शाता है कि उद्देश्य सत्य की खोज नहीं, बल्कि एक खास समुदाय के भीतर वैचारिक टकराव पैदा करना था. यह रणनीति अक्सर आरएसएस और दक्षिणपंथी विचारधारा से प्रेरित टीवी चैनलों द्वारा अपनाई जाती है, जहाँ चर्चा को जानबूझकर सांप्रदायिक रंग दिया जाता है.
सौरव द्विवेदी जैसे पत्रकारों पर यह आरोप अक्सर लगता रहा है कि वे अपनी देसी और सहज शैली की आड़ में उन मुद्दों को हवा देते हैं जो समाज को जोड़ने के बजाय बांटते हैं. जब मीडिया संस्थान किसी खास विचारधारा (जैसे आरएसएस) के मुखपत्र की तरह काम करने लगते हैं, तो पत्रकारिता ‘लोकतंत्र के चौथे स्तंभ’ से गिरकर ‘सत्ता के हाथ ही कठपुतली में तब्दील हो जाती है. हवा में ज़हर घोलने का काम केवल सीधे नफरत फैलाकर नहीं, बल्कि ऐसे बौद्धिक युद्ध छेड़कर भी किया जाता है जिसका अंतिम परिणाम सामाजिक तनाव ही होता है.
लेख का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यदि इस बहस में जावेद अख्तर की बातें प्रभावी होतीं, तो उसे इस्लाम बनाम आधुनिकता के रूप में पेश किया जाता. और चूँकि यहाँ मुफ्ती साहब ने अपनी दलीलें मजबूती से रखीं, तो इसे एक अलग तरह के ध्रुवीकरण के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश की गई. यह खेल दोहरा है. यदि नास्तिक जीतता है तो धर्म खतरे में बताया जाता है, और यदि धार्मिक विद्वान जीतता है तो उसे कट्टरता के चश्मे से पेश करने की जमीन तैयार की जाती है. इस तरह के कार्यक्रमों का सबसे बुरा असर ‘न्यूट्रल’ या धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने पर पड़ता है. मीडिया का काम जनहित के मुद्दों (शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी) पर बात करना है, लेकिन वर्तमान दौर में आरएसएस समर्थित मीडिया तंत्र जनता का ध्यान भटकाने के लिए ईश्वर, धर्म और पहचान की राजनीति को मुख्यधारा में बनाए रखता है. आज का मीडिया लोकतंत्र का प्रहरी होने के बजाय विवादों का व्यापारी बन गया है. सौरव द्विवेदी जैसे पत्रकारों को यह समझना होगा कि पत्रकारिता का धर्म समाज में संवाद स्थापित करना है, न कि उसे रणभूमि में बदलना. यदि मीडिया संस्थानों ने अपनी वैचारिक झुकाव को राष्ट्रहित से ऊपर रखा, तो वे समाज में केवल नफरत और जहर ही बांटेंगे, जिसकी भरपाई आने वाली पीढ़ियां भी नहीं कर पाएंगी.
मीडिया द्वारा समाज में दरार पैदा करने के तरीके :
जिहाद शब्दावली का दुरुपयोग: कई चैनलों ने ‘लैंड जिहाद’, ‘लव जिहाद’, ‘यूपीएससी जिहाद’ और ‘आर्थिक जिहाद’ जैसे शब्द गढ़े हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि यह शब्दावली आरएसएस की उस विचारधारा का विस्तार है जो एक खास समुदाय को अंदरूनी दुश्मन के रूप में पेश करती है.
असंतुलित पैनल चर्चा: चैनलों की यह पुरानी रणनीति रही है कि वे एक तरफ बेहद उदारवादी व्यक्ति को रखते हैं और दूसरी तरफ किसी कट्टरपंथी छवि वाले व्यक्ति को. इसका उद्देश्य किसी सार्थक नतीजे पर पहुंचना नहीं, बल्कि दर्शकों के मन में यह बिठाना होता है कि दूसरा पक्ष तर्कहीन या कट्टर है.
वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाना: जब भी देश में बेरोजगारी, महंगाई या आर्थिक मंदी जैसे गंभीर सवाल उठते हैं, तब अक्सर ये चैनल मंदिर-मस्जिद, हिंदू-मुस्लिम या ईश्वर है या नहीं जैसे भावनात्मक मुद्दों पर बहस शुरू कर देते हैं. इसे ‘एजेंडा सेटिंग’ कहा जाता है, जिसका सीधा लाभ सत्ताधारी विचारधारा को मिलता है.
डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का ‘सॉफ्ट प्रोपेगेंडा’: लल्लनटॉप जैसे प्लेटफॉर्म्स अपनी भाषा को बहुत ही अनौपचारिक और ‘मित्रवत’ रखते हैं. लेकिन इनके विषयों का चयन (जैसे जावेद अख्तर बनाम मुफ्ती) अक्सर उसी सामाजिक विभाजन को गहरा करता है जिसे टीवी चैनल चिल्लाकर करते हैं. यह ‘सॉफ्ट प्रोपेगेंडा’ अधिक खतरनाक माना जाता है क्योंकि यह निष्पक्षता के मुखौटे में आता है.
समाज पर इसका दीर्घकालिक प्रभाव :
सहिष्णुता में कमी: जब लोग दिन-रात स्क्रीन पर धर्म और पहचान की लड़ाई देखते हैं, तो उनके भीतर दूसरे समुदायों के प्रति अविश्वास पैदा होता है.
पत्रकारिता की विश्वसनीयता का अंत: जब पत्रकार सवाल पूछने के बजाय किसी विचारधारा (जैसे आरएसएस) के एजेंट के रूप में काम करते हैं, तो आम आदमी का मीडिया से भरोसा उठ जाता है. सौरव द्विवेदी जैसे पत्रकार युवाओं के बीच लोकप्रिय हैं. यदि वे विवादित और भड़काऊ विषयों को ‘कूल’ तरीके से पेश करेंगे, तो युवा पीढ़ी तार्किक सोच के बजाय वैचारिक नफरत की ओर बढ़ सकती है.
मीडिया, कॉर्पोरेट और राजनीति: ‘क्रॉनी जर्नलिज्म’ का जाल :
आज भारत के अधिकांश बड़े मीडिया संस्थान कुछ गिने-चुने अरबपतियों के हाथों में हैं. इनका उद्देश्य पत्रकारिता से मुनाफा कमाना कम और अपनी अन्य व्यावसायिक परियोजनाओं के लिए सरकार से अनुकूल नीतियां बनवाना अधिक होता है.
रिलायंस इंडस्ट्रीज (मुकेश अंबानी): ‘Network18’ समूह (जिसमें News18, CNN-News18, और कई क्षेत्रीय चैनल शामिल हैं) का मालिकाना हक रिलायंस के पास है. अंबानी के सत्ता के साथ करीबी संबंधों के कारण इन चैनलों का झुकाव अक्सर दक्षिणपंथी एजेंडे की ओर रहता है.
अडाणी समूह (गौतम अडाणी): हाल ही में अडाणी समूह ने NDTV का अधिग्रहण किया. इसके बाद NDTV की संपादकीय नीति में बड़े बदलाव देखे गए हैं, जिसे आलोचक स्वतंत्र पत्रकारिता का अंत मानते हैं.
आदित्य बिड़ला समूह: India Today Group (जिसका हिस्सा लल्लनटॉप और आज तक हैं) में आदित्य बिड़ला समूह की बड़ी हिस्सेदारी है. मीडिया संस्थानों की आय का सबसे बड़ा स्रोत सरकारी विज्ञापन होता है. केंद्र और राज्य सरकारों के पास अरबों रुपये का विज्ञापन बजट होता है. जो चैनल सरकार या उसकी विचारधारा (आरएसएस) के खिलाफ रिपोर्टिंग करते हैं, उनके विज्ञापन काट दिए जाते हैं. इसके विपरीत, जो चैनल ‘हिंदू-मुस्लिम’ बहस या सरकारी योजनाओं का गुणगान करते हैं, उन्हें भारी-भरकम फंडिंग मिलती है. यह आर्थिक दबाव संपादकों को गोदी मीडिया बनने पर मजबूर कर देता है. सौरव द्विवेदी का प्लेटफॉर्म लल्लनटॉप, ‘इंडिया टुडे ग्रुप’ का हिस्सा है जिसके चेयरमैन अरुण पुरी हैं. इंडिया टुडे ग्रुप को अक्सर बैलेंसिंग एक्ट के लिए जाना जाता था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसके कार्यक्रमों (जैसे ‘एजेंडा आज तक’) में दक्षिणपंथी नेताओं और विचारधारा को जितना मंच मिला है, उससे इसके झुकाव का पता चलता है. लल्लनटॉप जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को विज्ञापन के अलावा ‘व्यूअरशिप’ से पैसा मिलता है. ईश्वर बनाम मुफ्ती जैसे विवादास्पद थंबनेल और विषय अधिक क्लिक्स और शेयर लाते हैं, जिससे विज्ञापन राजस्व (YouTube Ad Revenue) बढ़ता है. यहां व्यापार और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण एक-दूसरे के पूरक बन जाते हैं. कई मीडिया घरानों के मालिक सीधे तौर पर राजनीति से जुड़े हैं.




