Wednesday, January 28, 2026
Wednesday, January 28, 2026
Wednesday, January 28, 2026
spot_img
spot_img
A venture of Pen First Media and Entertainment Pvt. Ltd
Member of Working Journalist Media Council Registered by - Ministry of Information and and Broadcasting, Govt. Of India. New Delhi
HomeHindiजब भूख ने मासूम का भविष्य बेच दिया: सत्ता की चूकों का...

जब भूख ने मासूम का भविष्य बेच दिया: सत्ता की चूकों का काला आईना

By – Waseem Raza Khan

मानव सभ्यता का सबसे बुनियादी कर्तव्य है हर व्यक्ति को भोजन, सुरक्षा और सम्मान मिले. यह किसी भी देश की सरकार की पहली और सबसे पवित्र जिम्मेदारी होती है. परंतु जब एक समाज इस स्थिति पर पहुँच जाए कि अभाव की मार झेल रहे माता-पिता अपने ही बच्चे को भोजन के बदले बेचने पर मजबूर हो जाएँ, तो यह केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था की करारी नाकामी का प्रमाण बन जाता है. महाराष्ट्र के त्र्यंबकेश्वर जैसे आध्यात्मिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध क्षेत्र से सामने आई घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया है. 14 बच्चों वाला एक दंपति जिसे गरीबी, बेरोज़गारी और भोजन की कमी ने जकड़ रखा था अपनी मजबूरी में अपने ही बच्चे को बेचने पर विवश हुआ. यह केवल एक “समाचार” नहीं, बल्कि प्रशासनिक उदासीनता का एक भयावह प्रतीक है. सरकार किस मुंह से विकास की बात करे, जब भूख और बेबसी किसी मासूम के भविष्य का मूल्य तय कर रही हो? किस प्रकार का कल्याण राज्य है वह, जहाँ एक सर्वे के दौरान ऐसी हृदयविदारक सच्चाई सामने आ जाए और फिर भी व्यवस्था अपनी असफलता से आँखें चुराती रहे? जांच यह भी जारी है कि कहीं दंपति केवल रोजगार के लिए तो बच्चे पैदा नहीं कर रहा था? यदि मनुष्य हर प्रकार से रोजगार पाने में असफल रहे और दो रोटी के लिए तरसता रहे तो किसी भी प्रकार के अपराध के बारे में सोच सकता है. हालांकि ऐसा करना अपराध है लेकिन शासन प्रशासन इसके लिए जिम्मेदार माने जा सकते हैं कि दंपति से दो रोटी कमाने के लिए यह नया तरीका ढूंढ निकाला है. यह घटना बताती है कि कागज़ों पर चल रही योजनाओं और ज़मीन पर जी रहे लोगों के जीवन में कितना गहरा अंतर है. सामाजिक सुरक्षा योजनाएं, पोषण कार्यक्रम, रोजगार मिशन इनका अर्थ तभी है जब वे भूख से जूझ रहे लोगों तक पहुंचें. अन्यथा, वे सिर्फ़ भाषणों की शोभा बढ़ाने वाले खोखले वादे बनकर रह जाते हैं.सरकार को समझना होगा कि गरीबी केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि लाखों असली चेहरों का सच है. क्विंटल भर ‘डेटा’ किसी एक छोटे से बच्चे की आँखों में बसी भूख को नहीं छुपा सकता. और न ही प्रशासनिक उदासीनता को माफ़ कर सकता है. यह घटना हमें आईना दिखाती है, ऐसा आईना जिसमें हम प्रगति के दावों की चमक नहीं, बल्कि उपेक्षित नागरिकों के आँसू देखते हैं. ऐसी कहीं भी होने वाली मजबूरी, किसी भी प्रशासन पर गहरा कलंक है. और जब तक व्यवस्था इन घावों को भरने की ईमानदार कोशिश नहीं करेगी, तब तक विकास एक खोखला भ्रम ही बना रहेगा. आज ज़रूरत है संवेदनशील नीति-निर्माण की, जवाबदेही की, और सबसे बढ़कर मानव जीवन को प्राथमिकता देने की. क्योंकि जब एक देश अपने सबसे नाज़ुक नागरिकों की रक्षा नहीं कर पाता, तो कोई भी उपलब्धि उसकी असफलता से बड़ी नहीं हो सकती.

RELATED ARTICLES
- Advertisment -spot_img

Most Popular

You cannot copy content of this page

error: Content is protected !!