By – Waseem Raza Khan (Chief Editor)
महाराष्ट्र के नाशिक शहर में वर्ष 2027 में होने वाला अगला सिंहस्थ कुंभ मेला धार्मिक आस्था का एक विशाल संगम होने के साथ-साथ राज्य की राजनीति और प्रशासन की तैयारियों का भी एक बड़ा अखाड़ा बन गया है. शासन और प्रशासन ने इस महाआयोजन के लिए कमर कस ली है, जिसके तहत हजारों करोड़ रुपये के फंड को मंजूरी दी जा रही है और व्यवस्थापन के लिए बड़े-बड़े अधिकारियों की नियुक्ति की गई है. कुंभ मेला 2027 की तैयारियों को लेकर सरकारी मशीनरी पूरी तरह से सक्रिय है. शुरुआती चरण में ही सरकार ने करीब 5.5 हजार करोड़ खर्च करने की तैयारी दिखाई है. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के हाथों कार्यों का विधिवत शुभारंभ भी कर दिया गया है. इस विशाल राशि का उपयोग आधारभूत संरचना, तीर्थयात्रियों के लिए आवास, परिवहन व्यवस्था, घाटों का नवीनीकरण, स्वास्थ्य सुविधाओं और सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने में किया जाएगा. कुंभ मेले के सफल आयोजन के लिए एक उच्च-स्तरीय प्रशासनिक ढांचा तैयार किया गया है. बड़े अधिकारियों को विभिन्न समितियों और परियोजनाओं का जिम्मा सौंपा गया है, ताकि कार्यों को समय पर और निर्धारित गुणवत्ता के साथ पूरा किया जा सके. नाशिक शहर के सौंदर्यीकरण और कुंभ क्षेत्र के विकास के लिए विभिन्न परियोजनाएं शुरू की गई हैं. यह प्रयास है कि कुंभ केवल एक धार्मिक आयोजन न रहे, बल्कि नाशिक शहर के लिए एक स्थायी विकास की विरासत भी छोड़कर जाए. कुंभ मेले की प्रशासनिक तैयारियों के बीच, जिस एक मुद्दे पर लोगों का ध्यान जा रहा है, वह है सत्ताधारी महायुति (भाजपा, शिवसेना, और राकांपा) का श्रेय लेने का प्रयास. यह एक सर्वविदित तथ्य है कि कुंभ मेले के आयोजन पर होने वाला पूरा खर्च राज्य सरकार और केंद्र सरकार के फंड से वहन किया जा रहा है. यानी यह पैसा जनता के करों से आ रहा है. इसके बावजूद, हर छोटे-बड़े कार्य के शुभारंभ, निरीक्षण या घोषणा के समय महायुति के तीनों घटक दलों के मंत्री और नेतागण खुद को केंद्र में रख रहे हैं. विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों और विज्ञापनों में इन नेताओं की तस्वीरें और उनके वक्तव्यों को प्रमुखता दी जा रही है, जिससे यह आभास होता है कि जैसे यह कार्य सरकार द्वारा नहीं, बल्कि इन राजनीतिक पार्टियों के निजी प्रयासों से हो रहे हैं. यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक और प्रशासनिक नैतिकता के विरुद्ध है. सरकारी पैसे से होने वाले विकास कार्यों का श्रेय लेना ‘सरकारी खर्च पर पार्टी प्रचार’ की श्रेणी में आता है. सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते, भाजपा सबसे अधिक ‘वाहवाही’ बटोरने का प्रयास कर रही है, अपने मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों के माध्यम से. सहयोगी दल भी अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में या अपने विभाग से जुड़े कार्यों में अपनी उपस्थिति और योगदान को लगातार दर्शाने का प्रयास कर रहे हैं, ताकि वे भी इस ‘विकास’ के राजनीतिक लाभ से वंचित न रह जाएं. यह राजनीतिकरण एक गंभीर विषय है. कुंभ मेला एक राष्ट्रीय और धार्मिक आयोजन है, जिसे राजनीतिक एजेंडे से ऊपर रखा जाना चाहिए. प्रशासन का काम निर्बाध रूप से व्यवस्था करना है, और नेताओं का काम केवल सहयोग और निगरानी करना होना चाहिए, न कि हर कदम पर श्रेय बटोरने का प्रयास करना. जनता के पैसे से किए जा रहे कार्यों पर राजनीतिक दल का लेबल लगाना स्वस्थ राजनीति का परिचायक नहीं है. नाशिक कुंभ 2027 की तैयारियां ज़ोरों पर हैं और यह सुनिश्चित करना प्रशासन का मुख्य उद्देश्य है कि यह आयोजन सफल हो. लेकिन, जिस तरह से महायुति सरकार के नेता सरकारी खर्च को अपने राजनीतिक लाभ के लिए भुनाने का प्रयास कर रहे हैं, वह कुंभ की धार्मिक गरिमा और प्रशासनिक पारदर्शिता पर एक प्रश्नचिह्न लगाता है. यह देखना होगा कि आने वाले समय में राजनीतिक दल ‘लोक-सेवा’ और ‘स्व-प्रचार’ के बीच की रेखा को कितना बनाए रख पाते हैं.




