वसीम रज़ा खान (मुख्य संपादक)
शिक्षा क्षेत्र में भ्रष्टाचार की शुरूआत कब और कैसे हुई इसका अंदाजा लगाना तो मुश्किल है लेकिन कहा जा सकता है कि जब से संस्थानों ने शिक्षा क्षेत्र में कमाई करने का रास्ता ढूंढा है हर वर्ष किसी न किसी शकल में गबन के मामले सामने आ रहे हैं. शिक्षा क्षेत्र में ऐसे संस्थान काम कर रहे हैं जिनका संबंध किसी न किसी बडे व्यापार, कंपनी के ग्रूप या राजनीतिक लोगों से होता है. संस्थान करोडों रूपये खर्च करके सरकार से अनुमती प्राप्त कर अपने विद्यालय तो शुरू कर लेते हैं, फिर निवेश किए गए करोडों रूपयों को वसूलने के लिए कई प्रकार के तरीके अपनाए जाते हैं, आसानी से पैसे वसूल होते देख फिर संस्था चालक सरकारी अधिकारियों का सहारा लेते हैं, कई बार सरकारी अधिकारी खुद संस्थ चालकों को भ्रष्टाचार का रास्ता दिखाते ताकि अधिकारियों को भी उन ‘कट’ मिलता रहे. शिक्षा का यह भ्रष्ट कारोबार न केवल संस्था चालकों बल्कि शिक्षा विभाग के चपरासी से लेकर अधिकारियों तक और विद्यालय के हेडमास्टर के बैंक खातों तक चलता है. स्कूलों में भ्रष्ट कमिटी में स्कूल के हेड मास्टर को भी शामिल किया जाता है, हेड मास्टर अपने स्टाफ से कुछ भरोसे के शिक्षकों को भी साथ रखता है ताकि ऊपर से नीचे सभी को बिना किसी कठिनाई के ‘मैनेज’ किया जा सके.
शिक्षा से जुडे यह गबन पूरे भारत में माफिया की शकल में काम कर रहे हैं, ऐसे में राजनेताओं के भी इस भ्रष्टाचार में माफिया का मौसेरा भाई होने में कोई संदेह नहीं. शिक्षा क्षेत्र में भ्रष्टाचार करने के कई तरीके हैं जिन से करोडों रूपयों का गबन आसानी से किया जा सकता है.
प्रवेश और दाखिले में भ्रष्टाचार :
अवैध डोनेशन/कैपिटेशन फीस: कई निजी शिक्षण संस्थान (विशेषकर मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज) प्रवेश के लिए निर्धारित शुल्क से कहीं अधिक डोनेशन या कैपिटेशन फीस की मांग करते हैं. यह उन छात्रों को बाहर कर देता है जो मेधावी होते हैं लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं.
प्रवेश परीक्षाओं में धांधली: परीक्षा के प्रश्नपत्रों का लीक होना, नकल करवाना, या उत्तर पुस्तिकाओं में हेरफेर करना आम बात है. व्यापम घोटाला जैसे मामले इसके प्रमुख उदाहरण हैं, जहां सरकारी नौकरियों और मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ.
भाई-भतीजावाद और पक्षपात: प्रभावशाली व्यक्तियों के बच्चों या रिश्तेदारों को योग्यता के बावजूद प्रवेश देना या विशेष सीटें आरक्षित करना भी भ्रष्टाचार का एक रूप है.
शिक्षण और मूल्यांकन में भ्रष्टाचार :
शिक्षकों की अनुपस्थिति (Teacher Absenteeism): कई सरकारी स्कूलों में शिक्षक नियमित रूप से स्कूल नहीं आते, या फिर आते भी हैं तो ठीक से नहीं पढ़ाते. इससे छात्रों की पढ़ाई पर नकारात्मक असर पड़ता है.
घोस्ट टीचर (Ghost Teachers): ऐसे शिक्षकों का रिकॉर्ड में होना जो वास्तव में पढ़ाते नहीं हैं, लेकिन उनका वेतन निकाला जाता है.
आंतरिक मूल्यांकन में हेरफेर: शिक्षकों द्वारा छात्रों से पैसे लेकर या पक्षपात के आधार पर उन्हें बेहतर आंतरिक अंक देना, खासकर प्रैक्टिकल परीक्षाओं में.
परीक्षा में अनुचित साधन (Unfair Means): परीक्षा के दौरान नकल की अनुमति देना, निरीक्षकों द्वारा मिलीभगत करना, या उत्तर पुस्तिकाओं का गलत मूल्यांकन करना.
नकली डिग्री/प्रमाणपत्र (Fake Degrees/Certificates): ऐसे संस्थानों का अस्तित्व जो बिना किसी वास्तविक शिक्षा के पैसे लेकर डिग्री या डिप्लोमा बेचते हैं.
शिक्षकों की भर्ती और प्रबंधन में भ्रष्टाचार :
शिक्षक भर्ती में रिश्वत: शिक्षकों की नियुक्ति में पैसे लेकर या सिफारिश के आधार पर अयोग्य व्यक्तियों को नियुक्त करना. इससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है क्योंकि योग्य शिक्षक नहीं मिल पाते.
स्थानांतरण में भ्रष्टाचार: शिक्षकों के स्थानांतरण के लिए रिश्वत लेना या राजनीतिक दबाव का उपयोग करना.
अकादमिक नेतृत्व में पक्षपात: शैक्षणिक संस्थानों के प्रमुख पदों पर योग्यता के बजाय राजनीतिक या अन्य संपर्कों के आधार पर नियुक्तियाँ करना.
धन के दुरुपयोग और खरीद में भ्रष्टाचार :
निधियों का गबन/दुरुपयोग: स्कूल/कॉलेज के विकास, बुनियादी ढांचे या उपकरणों की खरीद के लिए आवंटित धन का गबन करना या व्यक्तिगत लाभ के लिए उपयोग करना.
किताबों और आपूर्ति में धोखाधड़ी: पाठ्यपुस्तकों, स्टेशनरी या अन्य आवश्यक सामग्रियों की खरीद में धोखाधड़ी करना, खराब गुणवत्ता वाली सामग्री खरीदना या अधिक कीमत पर खरीदना.
छात्रवृत्ति घोटाला: योग्य छात्रों को मिलने वाली छात्रवृत्तियाँ फर्जी उम्मीदवारों को देना या छात्रवृत्ति की राशि का गबन करना.
अन्य प्रकार के भ्रष्टाचार :
यौन शोषण: कुछ मामलों में, शिक्षक या संस्थान के कर्मचारी छात्रों से बेहतर ग्रेड या अन्य लाभों के बदले यौन संबंध बनाने की मांग करते हैं.
निजी ट्यूशन का दबाव: कुछ शिक्षक छात्रों पर निजी ट्यूशन लेने का दबाव डालते हैं, ताकि वे अपनी आय बढ़ा सकें और कक्षा में ठीक से न पढ़ाएं. शिक्षा क्षेत्र में भ्रष्टाचार न केवल छात्रों के भविष्य को बर्बाद करता है बल्कि पूरे समाज में अविश्वास और असमानता को बढ़ावा देता है. इसे रोकने के लिए सख्त कानून, पारदर्शिता, जवाबदेही और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देना आवश्यक है. लेकिन क्या इसके लिए सरकार या राजनेताओं पर भरोसा किया जा सकता है? पूरे देश में कई ऐसे शिक्षा संस्थान हैं जहां करोडों रूपयों के भ्रष्टाचार जगहाजिर है लेकिन इस भ्रष्ट संस्थानों के मालिक बडे नेता, सत्ता में बैठे मंत्री, विधायक या सांसद हैं. ऐसे में अगर किसी शहर का विधायक या सांसद विधान सभी या लोकसभा में चिल्ला चिल्ला कर सरकार से गुहार भी लगाए तो क्या सरकार अपने नेताओं की इन दुकानों को बंद करने के लिए कडे कदम उठाएगी? नतीजा शून्य, गरीब जनता को या तो खन पसीना एक कर के भ्रष्टाचार में अपनी गाढी कमाई का योगदान देना होगा या यह छात्रों को यह सोच लेना होगा कि सपने गए भाड में, हमारी जितनी चादर है उतने ही पांव फैलाएं. हर बडे शहर में जहां शिक्षा माफिया अपने दांत गडाए आम जनता और मेधावी छात्रों का खून चूस रहे हैं वहां कोई समाज सेवक, आम आदमी आवाज भी उठाए तो उसकी कौन सुनेगा. पिछले दिनों एक ऐसी घटना सामने आई जिसे देख कर राजनेताओं पर भरोसा करना कठिन हो गया. मालेगांव के विधायक ने विधानसभा में आवाज उठाई कि शिक्षा मंत्री के क्षेत्र में ही विद्यालयों में करोडों का घोटाला हो रहा है. इस दौरान जिस समय मंत्री विधायक का जवाब देने के लिए खडे हुए उनके चेहरे पर विधायक के सवाल को लेकर ऐसे भाव थे जैसे उनका यह प्रश्न उनके सामने काई स्थान ही नहीं रखता. दूसरे विधायकों की हंसी भी उस समय देखी गई जैसे कह रहे हों कि न ही सवाल करने वाले विधायक दूध का धुला है और न ही मंत्री भ्रष्टाचार से दूर. जनता के लिए सब से बडी कठिनाई बच्चों की पढाई होती है. मां बाप बच्चों की अच्छी शिक्षा के लिए खून पसीना एक कर देते हैं और विधान भवन में उस जनता की सब से बडी समस्या को मजाक में उडा दिया जाता है. उस समय शिक्षा मंत्री का जवाब तो ऐसा होना चाहिए था कि अभिभावक उनपर गर्व करते, सरकार हर जिले में एक ऐसी कमिटी बना सकती है जो जिले के संस्थाओं में पहुंचकर सभी मामलों की बारीकी से जांच करे जिस में हिसाब किताब से लेकर तकनीकी और विद्यालयों से जुडे सभी विभागों के तज्ञ रहें और हर विद्यालय की बारीकी से रेकी करके हर दस्तावेज की ऑडिट की जाए. लेकिन क्या इसके लिए सरकार और नेताओं पर भरोसा किया जा सकता है. क्या भवनों में आवाज उठाने वाले नेता खुद भ्रष्ट नहीं हैं? या केवल रोतों के आंसू पोंछने के लिए या फिर सभा में अपनी उपस्थिती और प्रश्नों की संख्या बढाने के लिए आवाज रेकॉर्ड करवाई जा रही है.