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महाराष्ट्र में बिगड़ती राजनीति और “फूट डालो और हुकूमत करो” की नीति: एक गहन विश्लेषण

Waseem Raza Khan

महाराष्ट्र, भारत का एक प्रमुख राज्य, जो अपनी आर्थिक समृद्धि, सांस्कृतिक विविधता और ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता है, आजकल राजनीतिक अस्थिरता और अवसरवादी गठजोड़ के दौर से गुजर रहा है। हाल के वर्षों में यहाँ की राजनीति में जिस तरह की उथल-पुथल देखने को मिली है, वह न केवल राज्य के लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर कर रही है, बल्कि आम जनता के विश्वास को भी चोट पहुँचा रही है। इस अस्थिरता का एक प्रमुख कारण “फूट डालो और हुकूमत करो” की नीति है, जिसे अंग्रेजों ने औपनिवेशिक काल में अपनाया था और जो अब आधुनिक भारतीय राजनीति में विभिन्न रूपों में प्रकट हो रही है। इस लेख में हम महाराष्ट्र की मौजूदा राजनीतिक स्थिति का विश्लेषण करेंगे, इस नीति के प्रभाव को समझेंगे और अंधभक्तों के लिए भी कुछ सबक निकालेंगे।

महाराष्ट्र की राजनीति: हालिया संकटों का इतिहास

पिछले कुछ वर्षों में महाराष्ट्र की राजनीति में कई बड़े बदलाव देखने को मिले हैं। 2019 के विधानसभा चुनावों के बाद भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और शिवसेना का गठबंधन टूट गया, क्योंकि मुख्यमंत्री पद को लेकर सहमति नहीं बन पाई। इसके परिणामस्वरूप शिवसेना ने कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के साथ मिलकर महाविकास आघाड़ी (एमवीए) सरकार बनाई। यह गठबंधन शुरू से ही विचारधारा और महत्वाकांक्षा के टकराव का शिकार रहा। फिर 2022 में एकनाथ शिंदे ने शिवसेना में बगावत की और बीजेपी के समर्थन से सरकार बनाई। इसके बाद 2023 में एनसीपी में अजीत पवार के नेतृत्व में विभाजन हुआ, जिसने शरद पवार के गुट को कमजोर किया। ये घटनाएँ सत्ता के लिए अवसरवाद और “फूट डालो और हुकूमत करो” की नीति का स्पष्ट उदाहरण हैं।

2024 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी-शिंदे शिवसेना-अजीत पवार एनसीपी के महायुति गठबंधन ने प्रचंड जीत हासिल की, लेकिन यह जीत जनता के बीच एकता से ज्यादा विपक्ष की कमजोरी और ध्रुवीकरण की रणनीति का नतीजा थी। महाविकास आघाड़ी की हार ने यह साबित कर दिया कि जब तक विपक्षी दल आपसी मतभेदों को दूर नहीं करते, तब तक सत्ताधारी गठबंधन इसी तरह की रणनीति से लाभ उठाता रहेगा।

“फूट डालो और हुकूमत करो” का आधुनिक स्वरूप

ऐतिहासिक रूप से, “फूट डालो और हुकूमत करो” की नीति का प्रयोग अंग्रेजों ने भारत में विभिन्न समुदायों, जातियों और क्षेत्रों के बीच फूट डालकर अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए किया था। आज यह नीति सूक्ष्म रूप में मौजूद है, लेकिन इसका लक्ष्य वही है—शक्ति को बाँटना और विरोध को कमजोर करना। महाराष्ट्र में यह नीति कई तरीकों से प्रकट हुई है:

  1. पार्टियों का विभाजन: शिवसेना और एनसीपी जैसे मजबूत क्षेत्रीय दलों में टूट को बढ़ावा देना इस नीति का सबसे बड़ा उदाहरण है। एकनाथ शिंदे और अजीत पवार जैसे नेताओं को प्रलोभन देकर मूल दलों से अलग किया गया, जिससे उनकी ताकत कम हुई और बीजेपी को फायदा हुआ।
  2. ध्रुवीकरण की राजनीति: चुनावों में हिंदुत्व, क्षेत्रवाद और जातिगत मुद्दों को हवा देकर मतदाताओं को बाँटा गया। उदाहरण के लिए, “माझी लाडकी बहन योजना” जैसी कल्याणकारी योजनाओं को एक समुदाय के पक्ष में पेश किया गया, जबकि विपक्ष को इसके खिलाफ खड़ा कर जनता में भ्रम पैदा किया गया।
  3. गठबंधन का खेल: विचारधारा से परे अवसरवादी गठबंधन बनाना इस नीति का हिस्सा है। बीजेपी ने कभी शिवसेना को तोड़ा, तो कभी एनसीपी के एक धड़े को अपने साथ मिलाया, जिससे विपक्षी एकता को कमजोर किया जा सके।

प्रभाव और परिणाम

इस नीति के कई नकारात्मक प्रभाव महाराष्ट्र की राजनीति और समाज पर देखे जा सकते हैं:

  • लोकतंत्र की कमजोरी: बार-बार सरकारों का गिरना और बनना, विधायकों की खरीद-फरोख्त और अस्थिरता ने जनता के बीच लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर संदेह पैदा किया है।
  • विकास का ठहराव: सत्ता के इस खेल में विकास और जनहित के मुद्दे पीछे छूट गए हैं। बुनियादी ढांचा, रोजगार और शिक्षा जैसे क्षेत्र उपेक्षित हो रहे हैं।
  • सामाजिक विभाजन: ध्रुवीकरण की राजनीति ने समाज में नफरत और अविश्वास को बढ़ावा दिया है, जो दीर्घकालिक रूप से खतरनाक साबित हो सकता है।

अंधभक्तों के लिए सबक

जो लोग किसी एक पार्टी या नेता के प्रति अंधभक्ति रखते हैं, उनके लिए यह समझना जरूरी है कि राजनीति में कोई भी “मसीहा” नहीं होता। महाराष्ट्र का उदाहरण दिखाता है कि सत्ता की भूख में नेता और दल अपने मूल सिद्धांतों को भी त्याग देते हैं। यहाँ कुछ सीख हैं:

  1. आलोचनात्मक सोच अपनाएँ: किसी भी नेता या पार्टी की हर बात को आँख मूंदकर न मानें। उनके कार्यों और नीतियों का विश्लेषण करें कि वे जनता के हित में हैं या सिर्फ सत्ता के लिए।
  2. विभाजनकारी रणनीति को पहचानें: जब कोई पार्टी या नेता समाज को बाँटने की कोशिश करे, तो उसके पीछे का मकसद समझें। यह आपकी भावनाओं का शोषण हो सकता है।
  3. जिम्मेदारी माँगें: अपने नेताओं से विकास और जवाबदेही की माँग करें, न कि सिर्फ नारों और वादों पर भरोसा करें।

निष्कर्ष और आगे की राह

महाराष्ट्र की बिगड़ती राजनीति और “फूट डालो और हुकूमत करो” की नीति से निपटने के लिए सभी हितधारकों को जिम्मेदारी लेनी होगी। राजनीतिक दलों को अवसरवाद छोड़कर विचारधारा और जनहित पर ध्यान देना चाहिए। मतदाताओं को जागरूक होकर ऐसी नीतियों का विरोध करना चाहिए जो समाज को बाँटती हों। अगर महाराष्ट्र को फिर से अपनी खोई हुई गरिमा वापस पानी है, तो एकता, पारदर्शिता और विकास पर जोर देना होगा। यह समय है कि हम अतीत से सीखें और भविष्य को बेहतर बनाने के लिए कदम उठाएँ—न कि सिर्फ सत्ता के खेल में उलझे रहें।

अंधभक्ति छोड़ें, सच्चाई देखें, और अपने वोट की ताकत को समझें—यही लोकतंत्र की असली जीत होगी।

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