By – Waseem Raza Khan
महाराष्ट्र की माटी में भाषा की लड़ाई एक नया मोड़ लेती दिख रही है. एक तरफ़ हिंदी बनाम मराठी की बहस छिड़ी है और दूसरी तरफ़ हमारे मुख्यमंत्री का उपनाम ही फडणवीस है जो फारसी भाषा से आता है. यह दो शब्दों, फर्द और नवीस से मिलकर बना है. फर्द का अर्थ होता है कोई व्यक्ति या मामले का विषय और नवीस शब्द जिसका अर्थ है लेखक या क्लार्क. इस प्रकार, फडणवीस (Fadnavis) का शाब्दिक अर्थ मामलों या किसी फर्द के केस को संभालने वाला प्रमुख क्लार्क या लेखक. यह उपनाम अक्सर उन लोगों को दिया जाता था जो पेशवा काल में सरकारी कार्यालयों में महत्वपूर्ण लेखा-जोखा या प्रशासनिक कार्य संभालते थे.
इसके अलावा हमारे उपमुख्य मंत्री एकनाथ ‘शिंदे’ हैं, शिंदे भी एक फ़ारसी शब्द ‘शाह’ से बना है, जिसका अर्थ है राजा या शासक. यह एक विडंबना ही है कि जिस भाषा के वर्चस्व के लिए इतनी उठापटक मची है, उसके नायक का नाम ही एक विदेशी भाषा से जुड़ा है.
आजकल भाषा के नाम पर राजनीतिक रोटी सेकना आम बात हो गई है. जब कोई नेता एक भाषा को दूसरी भाषा से श्रेष्ठ बताता है तो वह समाज को दो हिस्सों में बाँटने का काम करता है. यही स्थिति महाराष्ट्र में भी देखने को मिल रही है, जहां मराठी अस्मिता के नाम पर हिंदीभाषियों पर हमला किया जाता है. पर यह बात हास्यास्पद लगती है कि जब हम अपने ही लोगों को भाषा के नाम पर पराया बना रहे हैं, तब हम यह भूल जाते हैं कि हमारे मुख्यमंत्री का उपनाम ही हमारी समृद्ध और मिश्रित संस्कृति का प्रतीक है.
फडणवीस अपने नाम की तरह न केवल एक फर्द अर्थात व्यक्ति के मामले संभाले हुए हैं बल्कि पूरे राज्य के नवीस (सेवक) बने हुए हैं, ‘शिंदे’ उपनाम हमें यह याद दिलाता है कि भाषाएं सीमाओं में नहीं बँधतीं, बल्कि वे एक दूसरे के साथ मिलकर एक नई पहचान बनाती हैं. फ़ारसी ने मराठी और हिंदी दोनों को प्रभावित किया है. कई शब्द जो हम रोज़मर्रा की ज़िंदगी में इस्तेमाल करते हैं, वे फ़ारसी से ही आए हैं. जैसे कि ‘जवाब’, ‘सजा’, ‘इंसाफ़’, और ‘शहीद’. ये शब्द हमारी भाषा का अभिन्न अंग बन गए हैं. तो फिर हम क्यों भाषा को धर्म या जाति की तरह देखकर उसके नाम पर लड़ रहे हैं?
यह समय है कि हम इन भाषाई लड़ाइयों से ऊपर उठकर अपनी मिली-जुली विरासत को स्वीकार करें. मुख्यमंत्री का फ़ारसी उपनाम एक मौन कटाक्ष है उन लोगों पर जो भाषा के नाम पर नफ़रत फैला रहे हैं. यह एक सबक है कि भाषा कोई दीवार नहीं, बल्कि एक पुल है जो हमें एक दूसरे से जोड़ता है. आइए, भाषा के नाम पर होने वाली इस निरर्थक लड़ाई को समाप्त करें और अपनी मिली-जुली संस्कृति का जश्न मनाएँ.